Thursday, July 23, 2020

अमृता - इमरोज़ के प्रेम पत्र

मेरे इमरोज़ !!!

आज मेरे हाथ से मेरी कलम छूट गई - शायद आज वह मेरे एक सौ चालीस लाख पंजाबियों के घर-घर जाकर उन्हें कुछ पूछने बताने चली गई है - आज मैं रोमानिया की उस लाइब्रेरी में बैठी थी, जिसका नाम है बी. पी. टी.| यह बिबलोपेका पैंतरू तोतास का संछेप है, और इसका अर्थ है "हर मनुष्य लाइब्रेरी|"

इस लाइब्रेरी में प्रकाशक हर सप्ताह एक किताब छापते हैं, हर किताब के 400 से 500 सफ़े होते हैं और हर किताब का पहला संस्करण 75000 का होता है और हर किताब के कई संस्करण छपते हैं - किसी किसी के 20 संस्करण भी |

हर सप्ताह छपने वाली किताब कभी किसी रोमानियन लेखक की लिखी हुई होती है, और कभी किसी परदेसी किताब का तर्ज़ुमा | पर यह पुरे प्रकाशन का एक हिस्सा है - देसी और परदेसी साहित्य को छापने वाला | अगर इसके साथ 'केवल देसी' साहित्य के प्रकाशन को भी मिला लिया जाए तो हिसाब बनता है - हर डेढ़ दिन बाद एक किताब का प्रकाशन |

1931 की बात है - मुल्क में एक बहुत बड़े शायर की किताब छपी थी, जिसकी गिनती की सिर्फ 500 कॉपियाँ थीं | चौदह साल बीत जाने के बाद किसी को उस किताब की जरुरत पड़ी | उसने ख़रीदी, तो पता चला की अब तक वो 500 कॉपियाँ भी पूरी नहीं बिकी थीं | पर 1963 चढ़ा तो कैसे लोगो को उस किताब की प्यास लगी | उसी साल उस किताब का दूसरा संस्करण छपा - 6000 | और छपने के चौबीस घंटे के बाद उस किताब की एक कॉपी भी मिल सकनी भी मुश्किल हो गई और फिर उसी किताब का एक और संस्करण छापा गया - बीस हज़ार | और अब उसी किताब का एक और संस्करण छपा है - अस्सी हज़ार |

यह सब कुछ मेरे सपने से बहार नहीं, पर समझ से बाहर हैं | पता नहीं, ऐसे सपने समझ से बाहर क्यों होते हैं.....?

1934 में यह सपना हमारी भी समझ से बहार था.... यह लोग कहते हैं और बताते हैं - अब हर रोमानियन पहली तारीख़ को तनख़्वाह लेकर सबसे पहले किताबों की दुकान पर जाता है | इस साल किताबों की गिनती लोगो की मांग पर पूरी नहीं उतरी, इसलिए अगले साल से हम सप्ताह में एक किताब छापने की जगह दो किताबें छाप रहे हैं ....

सपने समझ की सीमा में किस तरह आते हैं ? शायद यही बात अपने लोगो से पूछने और बताने के लिए मेरी क़लम  मेरे हाथ से छूट गई है - और मुझे यहाँ रोमानिया में बैठी को लग रहा है कि वह इस समय हैरान और परेशान पंजाब की गलियों में भटक रही है.....

[ नार्द होटल, बुखारेस्ट, 26 सितंबर 1967 ]

तुम्हारी अमृता 

Monday, January 14, 2019

कुंभ........भारतीय सभ्यता की सनातन यात्रा

कुंभ, मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर।

विभिन्न भाषाएँ, विभिन्न वेशभूषायें, विभिन्न संस्कृतियाँ, विभिन्न सम्प्रदायें; लेकिन असंख्य विविधताओं के बीच एक आधारभूत साम्य हैं "कुंभ।" सत्य की खोज इतने विभिन्न मार्गो से। ये कुंभ मेला हैं, पृथ्वी पर होने वाला सबसे बड़ा आयोजन। कुंभ, भारत के ह्र्दय में झांकने का एक झरोखा है। कुंभ, मानव जीवन के आनंद का उत्सव है, मानव जीवन का महोत्सव है।

कुंभ मेला मूलतः संत और सन्यासियों का मेला है। जो बरसो गुफा, कंदराओं, पहाड़ो में रह कर लगातार ध्यान करते है या चरैवेति-चरैवेति का संकल्प लिए लगातार विचरण करते रहते है और समाज को समझते है जिससे समाज में व्याप्त बुराइयों को मिटा सके। ये सभी साधु बिना किसी आमंत्रण के कुंभ मेले का उत्सव मानाने के लिए एकत्रित होते है। कुंभ में ये सन्यासी, गृहस्त जीवन व्यतीत करने वालो के बीच आते है।

कुंभ मेला भारत का राष्ट्रीय समागम है। सनातन दर्शन या सनातन जीवन को समझने का एक बहुत जरुरी साधन है। भारत को समझने के लिए सनातन धर्म को समझना बहुत आवश्यक है और सनातन धर्म को कुम्भ से बेहतर और कही नहीं समझा जा सकता। हमारे शरीर में जो स्थान हमारे मस्तिष्क का है, वही स्थान कुंभ का सनातन धर्म में है, कुंभ सनातन धर्म को बौद्धिक शक्ति प्रदान करता है। जिन्हें भारत को समझना है वो कुंभ से अपनी यात्रा शुरू कर सकते है। कुंभ और भारत एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।

कुंभ मेला भारत में चार प्रमुख नदियों के किनारे लगता हैं - पूर्व में प्रयागराज, इलाहबाद में गंगा के तट पर, पश्चिम में उज्जैन में शिप्रा के तट पर, उत्तर में हर की पौड़ी हरिद्वार में गंगा के तट पर और दक्षिण में नासिक में गोदावरी के तट पर। कुंभ मेला लगभग 3 वर्षो में एक बार लगता है तथा एक स्थान पर छः वर्षो में अर्द्धकुंभ और बारह वर्षो में कुंभ का आयोजन होता हैं। सनातन धर्म में नदियों का प्रमुख स्थान रहा है। लगभग सभी प्रमुख तीर्थ किसी न किसी नदी के किनारे पर ही स्थित है। सनातन धर्म में नदियों के जल को 'मन को पवित्र' करने वाला मन गया है। कुंभ मेले में नदियों के किनारे एक पूरा नया नगर बसाया गया जाता है, इस दॄष्टि से देखा जाये तो कुंभ को एक यायावर नगर की संज्ञा भी दी जा सकती है। कुंभ का आयोजन तमाम अखाड़े मिल कर करते है, भिन्न-भिन्न अखाड़ों की पूजा पद्धत्ति भिन्न-भिन्न होती है, देवता भिन्न होते है, गुरु भिन्न होते है। वर्तमान में सनातन धर्म में 13 अखाड़े अस्तित्व में है।

वैसे तो कुंभ मेले का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है, ये एक परम्परागत मेला है जो वर्षो से संपन्न होता आ रहा है। लिखित इतिहास में सबसे पुराना इतिहास चीनी यात्री हेनसांग द्वारा (हर्षवर्धन के काल में) छठवीं शताब्दी में लिखित है, जिसमे उन्होंने लिखा है - "प्रयाग में हर छः वर्ष में लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं।" संभवतः उन्होंने यह वाक्य कुंभ के परिप्रेक्ष में ही लिखा होगा।

कुंभ मेला भारत की संत परंपरा को समझने का एक सुनहरा अवसर होता है। दूसरे रूप में कुंभ - शास्त्र परम्परा, साधना परंपरा और गृहस्त परंपरा, तीनो का एक समागम है। जिसमे गृहस्थ परंपरा के लोग, शास्त्र और साधना परंपरा के करीब आते है और सांसरिक दुःखो का त्याज्य करने की कोशिश करते है। कुंभ एक जरिया है - मैं कौन हूँ ? सत्य क्या है ? जैसे जटिल प्रश्नो के उत्तरो की खोज करने का। कुंभ आने वाला हर गृहस्थ, पर्यटक नहीं तीर्थाटन होता हैं, जिसकी खोज और समझ थोड़ी गहरी होती है। उसे बाहर कुछ नया नहीं ढूढ़ना होता है बल्कि अपने अंदर के "मैं" की खोज और उसका अस्तित्व और अर्थ जानना होता है। 

सनातन धर्म में कोई अंतिम सत्य नहीं माना गया है और ना ही किसी किताब में लिखा गया है। कुंभ उसी सत्य को जानने की एक आंतरिक यात्रा है। जिसमे जीवन के वास्तविक अर्थ को जानना होता हैं, स्वयं को समझना होता है। व्यक्त से अव्यक्त की यात्रा, स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा, जड़ से चेतन की यात्रा। कुंभ की प्रकृति मूल रूप से लोकतांत्रिक है, जिसमे भिन्न संप्रदाय, भिन्न देवता, भिन्न भाषा के लोगो का समागम है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ साथ प्रकृति के मूल विविधता को भी सम्मान देता है। भारत में जिस स्तर पर स्त्री पूजा या शक्ति पूजा का स्थान हैं, वह स्थान विश्व के किसी और धर्म में नहीं है। चूँकि कुंभ नदियों के तट पर ही आयोजित होता है और सनातन परम्परा में नदियों को शक्ति का स्त्रोत माना गया है। सनातन धर्म ने भारत में ज्ञान को समझने और पढ़ने-पढ़ाने के लिए कथावाचन या प्रवचन परंपरा का आरम्भ किया है। इस परंपरा से नैतिकता की बातो को कथाओं में सरलता से कह दिया जाता है, जिससे आम जनमानस को आसानी से वेद और उपन्यासों की बातों को समझाया जा सके। कुंभ एक आमंत्रण हैं अनंतता में खो जाने का।

कुंभ में धार्मिक किताबें और प्रदर्शनियाँ भी लगाई जाती हैं, जिससे भारतीय सामाजिक ताने-बाने की गहराई, अन्तर्सम्बन्ध और उसकी मजबूती से दर्शन कराता है। कुंभ आयोजन भारतीय सामाजिक सौहार्द व सेवा भावना का जीता जागता रूप है। कुंभ मेला हिंदु धर्म में प्रचलित नकारत्मक विचार जैसे जाति व्यवस्था, छुआछूत, मंदिरो के दर्शन का निषेध, जैसे असत्यों को एकदम उखाड़ फेकता है। कुंभ की अपनी एक अर्थव्यवस्था भी है, भले ही इसका कोई आधिकारिक ब्यौरा न हो, पर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

कुंभ अपने आप में एक उच्चीस्तरीय प्रबंधन, कुशल प्रशासन, पारस्परिक सहयोग और गहरी समझ का उदाहरण है। यह पश्चिम जगत के विकसित देशों के आयोजनकर्ताओं के लिए प्रबंधन के व्यावहारिक ज्ञान का एक अच्छा स्कूल है। चूँकि कुंभ आयोजन की कोई केंद्रीय सत्ता नहीं होती है इसलिए यह पृथ्वी पर  वाला सबसे आश्चयर्जनक आयोजन हैं। बिना किसी आमंत्रण, निवेदन के करोड़ो लोगों का एक समय पर, एक साथ, एक स्थान पर जुटना, जिसमे बिना किसी वाद-विवाद मात्र के बड़ी सरलता से एक माह से ज्यादा समय गुजार देना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

कुंभ मेला भारतीय सभ्यता द्वारा रचित एक अद्भुद रचना है, जहाँ ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जहाँ चेतना को पवित्रम माना गया हैं। जहाँ जीवन अपनी सम्पूर्णता व विविधता में पल्ल्वित हुआ है। कुंभ को समझने के लिए तार्किक विश्लेषण के साथ-साथ मनुष्य व समाज के गहरे अंतर्संबंध को जानने और समझने की जरुरत हैं। इसे समझने के लिए जरुरी है कि "हमारी सभ्यता को लेकर हमारी समझ परिपक्व हो।"

तो इसी के साथ.......

धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो।
गौ माता की जय हो। धरती माता की जय हो। अपने माता-पिता की जय हो।
जय हो पार्वतीपते हर हर हर महादेव..........!!!!!

Friday, August 17, 2018

असंभव अटल

भारत की वर्तमान राजनीति में अटल होना असंभव ही दिखाई देता है। असल नेताओं की ज़मात के वो आखिरी रहनुमा थे। अटल जी का राजनीतिक जीवन बहुत बड़ा रहा है, उन्होंने अपनी राजनीति का 90% वक़्त विपक्ष में रह कर गुजारा।
एक ऐसे नेता जिनकी चुनावी सभाओं में लोग खुद खींचे चले आते थे, ना कि आज के जैसे जबरदस्ती बुलवाए जाते थे। 
एक ऐसे वक्ता, जो रुक-रुक कर बोलने के लिए जाने जाते थे, शब्दों का चयन बहुत सधा हुआ होता था, समर्थकों से ज्यादा विपक्ष के लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे। एक दफ़ा संसद में नेहरू जी ने सत्ता पक्ष को शांत करवाते हुए कहा था कि "अटल बिहारी वाजपेयी को  सुनो।"
एक ऐसे कवि, जिन्होंने देशप्रेम, क्रन्तिकारी, निजी अनुभव, निजी सोच को लेकर बहुत सी कविताएँ लिखी। जनवरी 1977 को रामलीला मैदान में उन्होंने कुछ लाइनें पढ़ी... 

         "बड़ी मुद्दत बाद मिले है दीवाने, कहने-सुनने को है अफ़साने 
         खुली हवा में ज़रा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने।"

ये आपातकाल का आखिरी समय था। ये रैली इसलिए भी खास थी क्योंकि रैली को ना दिखाने के लिए सरकार ने दूरदर्शन पर उस समय की मशहूर फिल्म 'बॉबी' दिखाई थी, पर लोगो में ने बॉबी और रैली में से 'रैली' को चुना।

1996 में अटल जी पहली दफ़ा प्रधानमंत्री बने, उनकी यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पायी। सरकार बहुमत साबित नहीं कर पायी, अटल जी पर आरोप लगा कि सत्ता के लोभ में आकर यह सरकार बनायीं है। इस आरोप के जवाब में अटल जी ने संसद में जो कहा वो आज भी सुनने के लायक है।

1998 में अटल जी दूसरी बार प्रधानमंत्री पद के चुने गए। इस बार भी वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, सरकार 13 माह में ही गिर गयी। पर इस बीच "पोखरण परमाणु परीक्षण" हो चूका था। अटल जी शांति के पथ पर चलने वाले रहनुमा थे, पोखरण परीक्षण के बाद उन्होंने कहा, 'भारत में यह परीक्षण स्वयं की सुरक्षा और शांति के कार्यो के लिए किया है, इससे भारत अपनी विकास की यात्रा पर और तेज़ी से आगे बढ़ेगा।' परीक्षण की सफलता के बाद अटल जी ने तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार कलाम साहब के साथ परीक्षण स्थल का दौरा भी किया था।

1999 में तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली और अपने व्यक्तित्व के अनुरूप पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाया, परिणाम स्वरुप दिल्ली-लाहौर बस सेवा की शुरुवात हुई। जिसकी पहली यात्रा स्वयं प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने करी। उनके इसी शासनकाल में कारगिल का निर्णायक युद्ध भी लड़ा गया, जिसमे भारतीय सेना ने अभूतपूर्व जीत हासिल की, पर उस जीत की बहुत बढ़ी कीमत भी अदा करी। 2001 में "सर्व शिक्षा अभियान" की शुरुआत की। भारत में सड़को का जाल बिछाया। अटल जी को आधुनिक भारत का 'शेर शाह सूरी' कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 2002 में कलाम साहब को 'राष्ट्रपति' बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करी।

2004 की लोकसभा हार, जिसमे 'इंडिया शाइनिंग' का नारा पूरी तरह फेल हुआ। अंततः 2005 में अटल जी ने राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी।

चूँकि अटल जी को लेकर बहुत सारे किस्से है, बहुत सी किवदंतिया है, बहुत से तथ्य है, सहमतियाँ है, असहमति भी है, सत्ता पक्ष को लेकर समर्थन है, विपक्ष का विरोध भी है; ये सब होने के बावजूद अटल, अटल है।

मैं शुरू से ही अटल जी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, पर निजी तौर पर मैं उनकी कुछ बातों से कभी सहमत नहीं हुआ। जैसे, 1992 का बाबरी विध्वंस, 2002 के गुजरात दंगे। ऐसे मुद्दों पर उन्होंने कभी कड़ी आपत्ति दर्ज नहीं की। यदि किन्ही मुद्दों पर उनका रुख, पार्टी या संघ से जुदा होता तथा पार्टी और संघ उस मुद्दे आपत्ति जताते तो वह अपना फैसला बदल लिया करते थे। अटल जी ने हमेशा 'मध्यम मार्ग' पर चलने की कोशिश की। काल और परिस्तिथी के मुताबिक उन्होंने कड़ा रुख भी अपनाया। जिन बातों से असहमत होते थे उन बातों को बातों में ही बखूबी समझाया, जैसे- 'राजधर्म का पालन।' 

अटल जी ने विपक्ष में रहते हुए स्वयं को सत्ता पक्ष के लिए बखूबी तैयार किया। बोलने और भाषण की जो कला उनके पास थी वो उसमे माहिर थे, शब्दों और वाक्यों को भरपूर चबाते हुए बोलते थे। इस भाषण कला से उन्होंने नेहरू जी से लेकर वर्तमान राजनेताओं और आमजनो को अपना कायल बनाया। इतने सालो तक संसद में रहने के बावजूद उनमे कभी दिखावा, उद्दंडता, हवाई बातें, सत्ता का हमेशा विरोध, विरोधियों को न सुनना जैसी कुरीतियाँ उनमे कभी नहीं पनपी। वे हमेशा शांत, धीर-गंभीर, सभी को सुनने वाले, अपनी बातें बहुत अच्छे से समझाने वाले रहे है। असहमति को लेकर उनका ख्याल था कि 'यह (असहमति) लोकतंत्र के लिए टॉनिक जैसा है।' अटल जी हमेशा कहते थे "निंदक नियरे राखिये।" कश्मीर को लेकर उनकी नीति "जम्हूरियत, कश्मीरियत, इंसानियत" आज के दौर में भी उतनी ही कारगर है जितनी उस दौर में थी। 

 मेरी नज़र में अटल जी उस जमात के आखिरी नेता थे जिन्होंने असहमति, विरोध, प्रदर्शन, संसद में सकारात्मक बहस और उपस्तिथी जैसी कई चीजों को लोकतंत्र के लिए बहुत ज्यादा जरुरी माना। वो एक ऐसे नेता थे जिनसे आपकी चाहे लाख वैचारिक और सैद्धांतिक असहमति हो पर आप उनकी बातों को सुनेंगे जरूर और ज्यादतर बातों से सहमत भी होंगे।

                                                   
                  मौत की उमर क्या हैं? दो पल भी नहीं, 
                  ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। 

                  मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
                  लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूँ?     


Saturday, August 11, 2018

कांवड़ यात्रा

सावन का पवित्र महीना अपने चरम पर है। जगह-जगह कांवड़िये अपने-अपने कांवड़ के साथ झूमते हुए, गाते हुए, बोल बम का नारा बुलंद करते हुए चले जा रहे है। हमेशा से ही कांवड़ यात्रा बहुत ही शांत, आत्मिक शांति देने वाली, भीतर से पूरी तरह से तोड़ देने वाली रही है। कांवड़ यात्रा का इतिहास भी कई हज़ार साल पुराना है; पहला कांवड़ यात्री परशुराम और रावण को माना जाता है। यह यात्रा मुख्य रूप से उत्तर भारत में बहुत अधिक उत्साह और उमंग से करी जाती है; कांवड़ यात्रियों के लिए मुख्य नदी गंगा होती है, जिससे पानी लेकर यात्री नजदीकी शिवालय में अर्पित करते है; शिवालयों में मुख्य हैं - पुरामहादेव, औघड़नाथ (मेरठ), काशी विश्वनाथ (बनारस)। कहा जाता है, सबसे पहली कांवड़ यात्रा सुल्तानगंज से बैजनाथ महादेव, देवघर (झारखण्ड) के बीच हुई थी।

ये असल कांवड़ यात्रा है, पर वर्तमान कांवड़ यात्रा को लेकर मेरे पास कुछ सवाल है.....

01. किसी भी धार्मिक यात्रा या क्रियाकलाप में तिरंगे का फूहड़ उपयोग कितना उचित है ?
02. कांवड़ यात्रियों की टी-शर्ट पर मोदी और योगी की फोटो के क्या मायने है ?
03. धर्म में राजनीति का हस्तक्षेप, धर्म को कमजोर और दिखावे की वस्तु बना रहा है ?

हर हर महादेव, बोल बम
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अक्षय, नई दिल्ली
12/08/2018




Wednesday, July 25, 2018

राजनीति हमारे समाज का बूचड़खाना है !


दिल्ली में तीन लड़किया भुख से मर गयी। अगर आप अभी भी अपने रहनुमाओ पर फ़िदा है तो बहुत बेहतर है, आपके लिए समाज, सरकार, योजनाएँ जैसी चीजे बहुत बेहतर ढंग से चल रही है। आप खुश हो सकते है कि "आधार लिंक" हो जाने से सभी को राशन बहुत आसानी से मिलने लगा है और विकास भारत के आखरी छोर तक पहुंच चुका है, जहां तक सूरज की रौशनी भी नहीं पहुंच पाती है वहां तक। विदेशों से हमारे संबंध बहुत अच्छे हो गए है और 'गाय माता' अब गिफ्ट देने के काम भी आ रही है। 

तीनों लड़कियों में शिखा आठ साल की थी, मानसी चार साल की थी और पारुल दो साल की थी। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में भी साफ़ हो गया है कि मौत का कारण भूख ही था। भूख से मौत की खबरे पहले अफ़्रीकी देशो से आती थी पर अब भारत से भी आने लगी है और किसी पिछड़े राज्य से नहीं हमारी राजधानी से, जो पहले की "रेप कैपिटल" के नाम से मशहूर है। केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को बधाई देना चाहिए कि दिल्ली के माथे पर एक और तमगा लग गया है। 

हमारी सरकारे बूचड़खाने के उस मालिक की तरह है जो अपने मुताबिक जानवरों  (समाज)  को बदलती है। तमाम बूचड़खाने के मालिक रात में किसी डिस्को में बैठ कर जैम कर पार्टी करे है और कैमरे के सामने आँसू बहाते है और अपने-अपने भूचडख़ाने से निकले मांस के लोथड़ो को खुद भी खाते है और अपने पालतुओं को भी खिलाते है। भारत ही वो देश होगा जहाँ सरकारी योजनाएँ राजधानी दिल्ली में ही ठीक ढंग से लागू नहीं हो पा रही है और दावे किये जाते है कि हमने सारे देश को रोशन कर दिया। 

आखिर में बस इतना ही...... मुझको मेरा भारत दे दो, तुम्हारा इंडिया तुमको मुबारक। 

Sunday, May 8, 2016

ये क्या 'हैप्पी मदर्स डे' लगा रखा है....?

मदर्स डे अर्थात माँ दिवस को बीते हुए 1 घण्टा 33 मिनट और 50 सेकण्ड हो चुका है, पर कुछ लोगों को अभी भी अहसास है इसका। वैसे ये बेहतर है कि लोगों को इसका अहसास ताउम्र रहे तो। खैर मुझे भी लगा कि शायद यह सही है कि सभी चीजों का एक खास दिन चुन लो और जी भरकर उस एक खास चीज के लिए प्यार उड़ेल दो ताकि फिर साल भर तक वो चीज परेशान ना करे प्यार और अपनेपन के लिए। और बधाई हो इसके साथ ही हम आधुनिक हो गये, सभी के लिए एक दिन मयस्सर करके। पर याद रखो भारत भूमि हमेशा से ही पर्व और उल्लास की धरती रही है, यहाँ रोज ईद-दिवाली मनाए जाने की परंपरा रही है। पर खैर अब हम आधुनिक हो गये है।
आज फेसबुक, ट्विटर और वाट्सएप पर माँ के लिए प्यार देख कर आँखे भर आई। पर इसका थोड़ा भी प्यार असल जीवन में भी होता तो हम कब के कलंदर हो गये होते।

मेरे मुताबिक भारत में किसी भी चीज का दिन तय करना बेवकुफी है क्योंकि यहां ये मुमकिन नही है। मेरी माने तो असली मदर्स डे तब होगा, 
जब हम अपनी माँ-बहनों की गालिया नही बोलेगे, 
जब माँ बचा-कुछा जुठा खाना नही खाएगी, 
जब माँ घर में सबसे पहले खाना खाएगी क्योंकि खाना वही बनाती है, 
जब सभी वृद्ध आश्रम में ताला जड़ दिया जाएगा, 
जब घर का पुरूष अपने गंदे और जूठे, कपड़े-बर्तन स्वयं साफ नही करेगा, 
कोई बच्चा अपनी दादी-नानी से खराब व्यवहार के लिए मार खाएगा 
और जब माँ को भी वीकएंड मिलेगा। 
                                                इस स्थिति के बाद ही बोलिएगा कि हम माँ, बीबी, बहन, लड़की और महिलाओं का थोड़ा भी सम्मान करते है। ये मुश्किल तो बहुत ज्यादा है, क्योंकि इससे पुरूष प्रधान समाज की खोखली, गूढ़ और लादी हुई परंपरा का अंत होगा और अंततः पुरूष प्रधान समाज का विध्वंस होगा। फिर आएगी "समानता।"

हाँ, एक बात है, "माँ" शब्द अपने आप में "बाबा" के बिना अधुरा है और ये दोनों खुदा मिलकर ही हम और आप जैसे इंसानों का सृजन करते है। वैसे मैंने कही सुना भी है कि, "माँ के पैरों के नीचे जन्नत है और बाबा उस जन्नत मे जाने का दरवाजा है।" आप भगवान की पूजा ना करे ना सही पर माँ-बाबा की सेवा और सम्मान जरूर करे।

बाकि क्या है, देश तो चल ही रहा है। अब चिल करो और आराम से तान के सो। कूलर में पानी माँ ने भर ही दिया है और सबेरे के नाश्ते और आपके पसंद के खाने का इंतजाम करके रखा है और पानी की चिल्ड बाटल आपके बिस्तर के बगल मे रखी है, ताकि रात में कोई परेशानी ना हो आपको। अभी 2 बजे माँ सोने जा रही है और हमेशा कि तरह सुबह सुरज को मात दे देगी, क्योंकि आपको काॅलेज-स्कूल जाने मे देरी ना हो। अरे वो आपकी यूनिफाम छूट गयी थी प्रेस करने से अब माँ वो प्रेस करके ही सोएगी।
गुड नाइट माँ 

Thursday, November 26, 2015

२६/११, २००८ मुंबई हमला....

२६/११, २००८ मुंबई हमला....

१० हथियार बंद आतंकियों ने उस रात सिर्फ मुंबई ही नही पुरे भारत को ढहला दिया तथा। अचानक बम गोलियों की बौछार होने लगी और मासूमो को अपने आगोश में ले लिया । उस सर्द रात में पुरे मुंबई और देश का  हर घर और गली बारूद बारूद की गंध से भर गई । इस गंध को हटाने और देश को सुकून की नींद देने का जिम्मा उठाया " भारतीय सेना और मुंबई पोलीस " के वीर और सूरमा अधिकारियो और सैनिको ने, जिन्होंने सब  भूल कर अपना सर्वोच्च बलिदान दिया । मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, सीनियर इंस्पेक्टर विजय सालस्कर, एसीपी अशोक कामटे, एसआई तुकाराम ओम्ब्ले, एटीएस हेमंत करकरे, एनएसजी कमांडो सुरेंदर सिंह और मुंबई पोलीस के अन्य निर्भीक सिपाहियों ने ठाना की अब और मासूमो को नही मरने देंगे और "देश प्रथम और अतिथि देवो भवः " वाक्य को चरितार्थ करते हुए पहले देशवासियो और विदेशी सैलानियों को बचाया गया । उसके बाद नौ आतंकियों को मारकर तथा एक को गिरफ्तार करके हमले का दमन कर दिया । कुछ ने प्राण गवाए और कुछ ने अपने महत्पूर्ण अंगो का बलिदान दिया पर मुंबई को आजाद करवा ही दिया और विश्व को एक सन्देश दिया की जिसे जिसे भी भारत में आतंकी भेजना है भेजे, हम वीर, बहादुर सैनिको की गोलिया उनका स्वागत करने के लिए तैयार है।
मुंबई हमले के शहीदो को शत शत नमन......

है नमन उनको कि जो यशकाय को अमरत्व देकर
इस जगत मैं शौर्य की जीवित कहानी हो गए हैं.
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय
जो धरा पर गिर पड़े, पर आसमानी हो गए हैं






अमृता - इमरोज़ के प्रेम पत्र

मेरे इमरोज़ !!! आज मेरे हाथ से मेरी कलम छूट गई - शायद आज वह मेरे एक सौ चालीस लाख पंजाबियों के घर-घर जाकर उन्हें कुछ पूछने बताने चली गई है ...