Thursday, July 23, 2020

अमृता - इमरोज़ के प्रेम पत्र

मेरे इमरोज़ !!!

आज मेरे हाथ से मेरी कलम छूट गई - शायद आज वह मेरे एक सौ चालीस लाख पंजाबियों के घर-घर जाकर उन्हें कुछ पूछने बताने चली गई है - आज मैं रोमानिया की उस लाइब्रेरी में बैठी थी, जिसका नाम है बी. पी. टी.| यह बिबलोपेका पैंतरू तोतास का संछेप है, और इसका अर्थ है "हर मनुष्य लाइब्रेरी|"

इस लाइब्रेरी में प्रकाशक हर सप्ताह एक किताब छापते हैं, हर किताब के 400 से 500 सफ़े होते हैं और हर किताब का पहला संस्करण 75000 का होता है और हर किताब के कई संस्करण छपते हैं - किसी किसी के 20 संस्करण भी |

हर सप्ताह छपने वाली किताब कभी किसी रोमानियन लेखक की लिखी हुई होती है, और कभी किसी परदेसी किताब का तर्ज़ुमा | पर यह पुरे प्रकाशन का एक हिस्सा है - देसी और परदेसी साहित्य को छापने वाला | अगर इसके साथ 'केवल देसी' साहित्य के प्रकाशन को भी मिला लिया जाए तो हिसाब बनता है - हर डेढ़ दिन बाद एक किताब का प्रकाशन |

1931 की बात है - मुल्क में एक बहुत बड़े शायर की किताब छपी थी, जिसकी गिनती की सिर्फ 500 कॉपियाँ थीं | चौदह साल बीत जाने के बाद किसी को उस किताब की जरुरत पड़ी | उसने ख़रीदी, तो पता चला की अब तक वो 500 कॉपियाँ भी पूरी नहीं बिकी थीं | पर 1963 चढ़ा तो कैसे लोगो को उस किताब की प्यास लगी | उसी साल उस किताब का दूसरा संस्करण छपा - 6000 | और छपने के चौबीस घंटे के बाद उस किताब की एक कॉपी भी मिल सकनी भी मुश्किल हो गई और फिर उसी किताब का एक और संस्करण छापा गया - बीस हज़ार | और अब उसी किताब का एक और संस्करण छपा है - अस्सी हज़ार |

यह सब कुछ मेरे सपने से बहार नहीं, पर समझ से बाहर हैं | पता नहीं, ऐसे सपने समझ से बाहर क्यों होते हैं.....?

1934 में यह सपना हमारी भी समझ से बहार था.... यह लोग कहते हैं और बताते हैं - अब हर रोमानियन पहली तारीख़ को तनख़्वाह लेकर सबसे पहले किताबों की दुकान पर जाता है | इस साल किताबों की गिनती लोगो की मांग पर पूरी नहीं उतरी, इसलिए अगले साल से हम सप्ताह में एक किताब छापने की जगह दो किताबें छाप रहे हैं ....

सपने समझ की सीमा में किस तरह आते हैं ? शायद यही बात अपने लोगो से पूछने और बताने के लिए मेरी क़लम  मेरे हाथ से छूट गई है - और मुझे यहाँ रोमानिया में बैठी को लग रहा है कि वह इस समय हैरान और परेशान पंजाब की गलियों में भटक रही है.....

[ नार्द होटल, बुखारेस्ट, 26 सितंबर 1967 ]

तुम्हारी अमृता 

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अमृता - इमरोज़ के प्रेम पत्र

मेरे इमरोज़ !!! आज मेरे हाथ से मेरी कलम छूट गई - शायद आज वह मेरे एक सौ चालीस लाख पंजाबियों के घर-घर जाकर उन्हें कुछ पूछने बताने चली गई है ...