Saturday, August 11, 2018

कांवड़ यात्रा

सावन का पवित्र महीना अपने चरम पर है। जगह-जगह कांवड़िये अपने-अपने कांवड़ के साथ झूमते हुए, गाते हुए, बोल बम का नारा बुलंद करते हुए चले जा रहे है। हमेशा से ही कांवड़ यात्रा बहुत ही शांत, आत्मिक शांति देने वाली, भीतर से पूरी तरह से तोड़ देने वाली रही है। कांवड़ यात्रा का इतिहास भी कई हज़ार साल पुराना है; पहला कांवड़ यात्री परशुराम और रावण को माना जाता है। यह यात्रा मुख्य रूप से उत्तर भारत में बहुत अधिक उत्साह और उमंग से करी जाती है; कांवड़ यात्रियों के लिए मुख्य नदी गंगा होती है, जिससे पानी लेकर यात्री नजदीकी शिवालय में अर्पित करते है; शिवालयों में मुख्य हैं - पुरामहादेव, औघड़नाथ (मेरठ), काशी विश्वनाथ (बनारस)। कहा जाता है, सबसे पहली कांवड़ यात्रा सुल्तानगंज से बैजनाथ महादेव, देवघर (झारखण्ड) के बीच हुई थी।

ये असल कांवड़ यात्रा है, पर वर्तमान कांवड़ यात्रा को लेकर मेरे पास कुछ सवाल है.....

01. किसी भी धार्मिक यात्रा या क्रियाकलाप में तिरंगे का फूहड़ उपयोग कितना उचित है ?
02. कांवड़ यात्रियों की टी-शर्ट पर मोदी और योगी की फोटो के क्या मायने है ?
03. धर्म में राजनीति का हस्तक्षेप, धर्म को कमजोर और दिखावे की वस्तु बना रहा है ?

हर हर महादेव, बोल बम
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अक्षय, नई दिल्ली
12/08/2018




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