Monday, January 14, 2019

कुंभ........भारतीय सभ्यता की सनातन यात्रा

कुंभ, मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर।

विभिन्न भाषाएँ, विभिन्न वेशभूषायें, विभिन्न संस्कृतियाँ, विभिन्न सम्प्रदायें; लेकिन असंख्य विविधताओं के बीच एक आधारभूत साम्य हैं "कुंभ।" सत्य की खोज इतने विभिन्न मार्गो से। ये कुंभ मेला हैं, पृथ्वी पर होने वाला सबसे बड़ा आयोजन। कुंभ, भारत के ह्र्दय में झांकने का एक झरोखा है। कुंभ, मानव जीवन के आनंद का उत्सव है, मानव जीवन का महोत्सव है।

कुंभ मेला मूलतः संत और सन्यासियों का मेला है। जो बरसो गुफा, कंदराओं, पहाड़ो में रह कर लगातार ध्यान करते है या चरैवेति-चरैवेति का संकल्प लिए लगातार विचरण करते रहते है और समाज को समझते है जिससे समाज में व्याप्त बुराइयों को मिटा सके। ये सभी साधु बिना किसी आमंत्रण के कुंभ मेले का उत्सव मानाने के लिए एकत्रित होते है। कुंभ में ये सन्यासी, गृहस्त जीवन व्यतीत करने वालो के बीच आते है।

कुंभ मेला भारत का राष्ट्रीय समागम है। सनातन दर्शन या सनातन जीवन को समझने का एक बहुत जरुरी साधन है। भारत को समझने के लिए सनातन धर्म को समझना बहुत आवश्यक है और सनातन धर्म को कुम्भ से बेहतर और कही नहीं समझा जा सकता। हमारे शरीर में जो स्थान हमारे मस्तिष्क का है, वही स्थान कुंभ का सनातन धर्म में है, कुंभ सनातन धर्म को बौद्धिक शक्ति प्रदान करता है। जिन्हें भारत को समझना है वो कुंभ से अपनी यात्रा शुरू कर सकते है। कुंभ और भारत एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।

कुंभ मेला भारत में चार प्रमुख नदियों के किनारे लगता हैं - पूर्व में प्रयागराज, इलाहबाद में गंगा के तट पर, पश्चिम में उज्जैन में शिप्रा के तट पर, उत्तर में हर की पौड़ी हरिद्वार में गंगा के तट पर और दक्षिण में नासिक में गोदावरी के तट पर। कुंभ मेला लगभग 3 वर्षो में एक बार लगता है तथा एक स्थान पर छः वर्षो में अर्द्धकुंभ और बारह वर्षो में कुंभ का आयोजन होता हैं। सनातन धर्म में नदियों का प्रमुख स्थान रहा है। लगभग सभी प्रमुख तीर्थ किसी न किसी नदी के किनारे पर ही स्थित है। सनातन धर्म में नदियों के जल को 'मन को पवित्र' करने वाला मन गया है। कुंभ मेले में नदियों के किनारे एक पूरा नया नगर बसाया गया जाता है, इस दॄष्टि से देखा जाये तो कुंभ को एक यायावर नगर की संज्ञा भी दी जा सकती है। कुंभ का आयोजन तमाम अखाड़े मिल कर करते है, भिन्न-भिन्न अखाड़ों की पूजा पद्धत्ति भिन्न-भिन्न होती है, देवता भिन्न होते है, गुरु भिन्न होते है। वर्तमान में सनातन धर्म में 13 अखाड़े अस्तित्व में है।

वैसे तो कुंभ मेले का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है, ये एक परम्परागत मेला है जो वर्षो से संपन्न होता आ रहा है। लिखित इतिहास में सबसे पुराना इतिहास चीनी यात्री हेनसांग द्वारा (हर्षवर्धन के काल में) छठवीं शताब्दी में लिखित है, जिसमे उन्होंने लिखा है - "प्रयाग में हर छः वर्ष में लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं।" संभवतः उन्होंने यह वाक्य कुंभ के परिप्रेक्ष में ही लिखा होगा।

कुंभ मेला भारत की संत परंपरा को समझने का एक सुनहरा अवसर होता है। दूसरे रूप में कुंभ - शास्त्र परम्परा, साधना परंपरा और गृहस्त परंपरा, तीनो का एक समागम है। जिसमे गृहस्थ परंपरा के लोग, शास्त्र और साधना परंपरा के करीब आते है और सांसरिक दुःखो का त्याज्य करने की कोशिश करते है। कुंभ एक जरिया है - मैं कौन हूँ ? सत्य क्या है ? जैसे जटिल प्रश्नो के उत्तरो की खोज करने का। कुंभ आने वाला हर गृहस्थ, पर्यटक नहीं तीर्थाटन होता हैं, जिसकी खोज और समझ थोड़ी गहरी होती है। उसे बाहर कुछ नया नहीं ढूढ़ना होता है बल्कि अपने अंदर के "मैं" की खोज और उसका अस्तित्व और अर्थ जानना होता है। 

सनातन धर्म में कोई अंतिम सत्य नहीं माना गया है और ना ही किसी किताब में लिखा गया है। कुंभ उसी सत्य को जानने की एक आंतरिक यात्रा है। जिसमे जीवन के वास्तविक अर्थ को जानना होता हैं, स्वयं को समझना होता है। व्यक्त से अव्यक्त की यात्रा, स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा, जड़ से चेतन की यात्रा। कुंभ की प्रकृति मूल रूप से लोकतांत्रिक है, जिसमे भिन्न संप्रदाय, भिन्न देवता, भिन्न भाषा के लोगो का समागम है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ साथ प्रकृति के मूल विविधता को भी सम्मान देता है। भारत में जिस स्तर पर स्त्री पूजा या शक्ति पूजा का स्थान हैं, वह स्थान विश्व के किसी और धर्म में नहीं है। चूँकि कुंभ नदियों के तट पर ही आयोजित होता है और सनातन परम्परा में नदियों को शक्ति का स्त्रोत माना गया है। सनातन धर्म ने भारत में ज्ञान को समझने और पढ़ने-पढ़ाने के लिए कथावाचन या प्रवचन परंपरा का आरम्भ किया है। इस परंपरा से नैतिकता की बातो को कथाओं में सरलता से कह दिया जाता है, जिससे आम जनमानस को आसानी से वेद और उपन्यासों की बातों को समझाया जा सके। कुंभ एक आमंत्रण हैं अनंतता में खो जाने का।

कुंभ में धार्मिक किताबें और प्रदर्शनियाँ भी लगाई जाती हैं, जिससे भारतीय सामाजिक ताने-बाने की गहराई, अन्तर्सम्बन्ध और उसकी मजबूती से दर्शन कराता है। कुंभ आयोजन भारतीय सामाजिक सौहार्द व सेवा भावना का जीता जागता रूप है। कुंभ मेला हिंदु धर्म में प्रचलित नकारत्मक विचार जैसे जाति व्यवस्था, छुआछूत, मंदिरो के दर्शन का निषेध, जैसे असत्यों को एकदम उखाड़ फेकता है। कुंभ की अपनी एक अर्थव्यवस्था भी है, भले ही इसका कोई आधिकारिक ब्यौरा न हो, पर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

कुंभ अपने आप में एक उच्चीस्तरीय प्रबंधन, कुशल प्रशासन, पारस्परिक सहयोग और गहरी समझ का उदाहरण है। यह पश्चिम जगत के विकसित देशों के आयोजनकर्ताओं के लिए प्रबंधन के व्यावहारिक ज्ञान का एक अच्छा स्कूल है। चूँकि कुंभ आयोजन की कोई केंद्रीय सत्ता नहीं होती है इसलिए यह पृथ्वी पर  वाला सबसे आश्चयर्जनक आयोजन हैं। बिना किसी आमंत्रण, निवेदन के करोड़ो लोगों का एक समय पर, एक साथ, एक स्थान पर जुटना, जिसमे बिना किसी वाद-विवाद मात्र के बड़ी सरलता से एक माह से ज्यादा समय गुजार देना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

कुंभ मेला भारतीय सभ्यता द्वारा रचित एक अद्भुद रचना है, जहाँ ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जहाँ चेतना को पवित्रम माना गया हैं। जहाँ जीवन अपनी सम्पूर्णता व विविधता में पल्ल्वित हुआ है। कुंभ को समझने के लिए तार्किक विश्लेषण के साथ-साथ मनुष्य व समाज के गहरे अंतर्संबंध को जानने और समझने की जरुरत हैं। इसे समझने के लिए जरुरी है कि "हमारी सभ्यता को लेकर हमारी समझ परिपक्व हो।"

तो इसी के साथ.......

धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो।
गौ माता की जय हो। धरती माता की जय हो। अपने माता-पिता की जय हो।
जय हो पार्वतीपते हर हर हर महादेव..........!!!!!

अमृता - इमरोज़ के प्रेम पत्र

मेरे इमरोज़ !!! आज मेरे हाथ से मेरी कलम छूट गई - शायद आज वह मेरे एक सौ चालीस लाख पंजाबियों के घर-घर जाकर उन्हें कुछ पूछने बताने चली गई है ...