Friday, August 17, 2018

असंभव अटल

भारत की वर्तमान राजनीति में अटल होना असंभव ही दिखाई देता है। असल नेताओं की ज़मात के वो आखिरी रहनुमा थे। अटल जी का राजनीतिक जीवन बहुत बड़ा रहा है, उन्होंने अपनी राजनीति का 90% वक़्त विपक्ष में रह कर गुजारा।
एक ऐसे नेता जिनकी चुनावी सभाओं में लोग खुद खींचे चले आते थे, ना कि आज के जैसे जबरदस्ती बुलवाए जाते थे। 
एक ऐसे वक्ता, जो रुक-रुक कर बोलने के लिए जाने जाते थे, शब्दों का चयन बहुत सधा हुआ होता था, समर्थकों से ज्यादा विपक्ष के लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे। एक दफ़ा संसद में नेहरू जी ने सत्ता पक्ष को शांत करवाते हुए कहा था कि "अटल बिहारी वाजपेयी को  सुनो।"
एक ऐसे कवि, जिन्होंने देशप्रेम, क्रन्तिकारी, निजी अनुभव, निजी सोच को लेकर बहुत सी कविताएँ लिखी। जनवरी 1977 को रामलीला मैदान में उन्होंने कुछ लाइनें पढ़ी... 

         "बड़ी मुद्दत बाद मिले है दीवाने, कहने-सुनने को है अफ़साने 
         खुली हवा में ज़रा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने।"

ये आपातकाल का आखिरी समय था। ये रैली इसलिए भी खास थी क्योंकि रैली को ना दिखाने के लिए सरकार ने दूरदर्शन पर उस समय की मशहूर फिल्म 'बॉबी' दिखाई थी, पर लोगो में ने बॉबी और रैली में से 'रैली' को चुना।

1996 में अटल जी पहली दफ़ा प्रधानमंत्री बने, उनकी यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पायी। सरकार बहुमत साबित नहीं कर पायी, अटल जी पर आरोप लगा कि सत्ता के लोभ में आकर यह सरकार बनायीं है। इस आरोप के जवाब में अटल जी ने संसद में जो कहा वो आज भी सुनने के लायक है।

1998 में अटल जी दूसरी बार प्रधानमंत्री पद के चुने गए। इस बार भी वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, सरकार 13 माह में ही गिर गयी। पर इस बीच "पोखरण परमाणु परीक्षण" हो चूका था। अटल जी शांति के पथ पर चलने वाले रहनुमा थे, पोखरण परीक्षण के बाद उन्होंने कहा, 'भारत में यह परीक्षण स्वयं की सुरक्षा और शांति के कार्यो के लिए किया है, इससे भारत अपनी विकास की यात्रा पर और तेज़ी से आगे बढ़ेगा।' परीक्षण की सफलता के बाद अटल जी ने तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार कलाम साहब के साथ परीक्षण स्थल का दौरा भी किया था।

1999 में तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली और अपने व्यक्तित्व के अनुरूप पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाया, परिणाम स्वरुप दिल्ली-लाहौर बस सेवा की शुरुवात हुई। जिसकी पहली यात्रा स्वयं प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने करी। उनके इसी शासनकाल में कारगिल का निर्णायक युद्ध भी लड़ा गया, जिसमे भारतीय सेना ने अभूतपूर्व जीत हासिल की, पर उस जीत की बहुत बढ़ी कीमत भी अदा करी। 2001 में "सर्व शिक्षा अभियान" की शुरुआत की। भारत में सड़को का जाल बिछाया। अटल जी को आधुनिक भारत का 'शेर शाह सूरी' कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 2002 में कलाम साहब को 'राष्ट्रपति' बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करी।

2004 की लोकसभा हार, जिसमे 'इंडिया शाइनिंग' का नारा पूरी तरह फेल हुआ। अंततः 2005 में अटल जी ने राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी।

चूँकि अटल जी को लेकर बहुत सारे किस्से है, बहुत सी किवदंतिया है, बहुत से तथ्य है, सहमतियाँ है, असहमति भी है, सत्ता पक्ष को लेकर समर्थन है, विपक्ष का विरोध भी है; ये सब होने के बावजूद अटल, अटल है।

मैं शुरू से ही अटल जी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, पर निजी तौर पर मैं उनकी कुछ बातों से कभी सहमत नहीं हुआ। जैसे, 1992 का बाबरी विध्वंस, 2002 के गुजरात दंगे। ऐसे मुद्दों पर उन्होंने कभी कड़ी आपत्ति दर्ज नहीं की। यदि किन्ही मुद्दों पर उनका रुख, पार्टी या संघ से जुदा होता तथा पार्टी और संघ उस मुद्दे आपत्ति जताते तो वह अपना फैसला बदल लिया करते थे। अटल जी ने हमेशा 'मध्यम मार्ग' पर चलने की कोशिश की। काल और परिस्तिथी के मुताबिक उन्होंने कड़ा रुख भी अपनाया। जिन बातों से असहमत होते थे उन बातों को बातों में ही बखूबी समझाया, जैसे- 'राजधर्म का पालन।' 

अटल जी ने विपक्ष में रहते हुए स्वयं को सत्ता पक्ष के लिए बखूबी तैयार किया। बोलने और भाषण की जो कला उनके पास थी वो उसमे माहिर थे, शब्दों और वाक्यों को भरपूर चबाते हुए बोलते थे। इस भाषण कला से उन्होंने नेहरू जी से लेकर वर्तमान राजनेताओं और आमजनो को अपना कायल बनाया। इतने सालो तक संसद में रहने के बावजूद उनमे कभी दिखावा, उद्दंडता, हवाई बातें, सत्ता का हमेशा विरोध, विरोधियों को न सुनना जैसी कुरीतियाँ उनमे कभी नहीं पनपी। वे हमेशा शांत, धीर-गंभीर, सभी को सुनने वाले, अपनी बातें बहुत अच्छे से समझाने वाले रहे है। असहमति को लेकर उनका ख्याल था कि 'यह (असहमति) लोकतंत्र के लिए टॉनिक जैसा है।' अटल जी हमेशा कहते थे "निंदक नियरे राखिये।" कश्मीर को लेकर उनकी नीति "जम्हूरियत, कश्मीरियत, इंसानियत" आज के दौर में भी उतनी ही कारगर है जितनी उस दौर में थी। 

 मेरी नज़र में अटल जी उस जमात के आखिरी नेता थे जिन्होंने असहमति, विरोध, प्रदर्शन, संसद में सकारात्मक बहस और उपस्तिथी जैसी कई चीजों को लोकतंत्र के लिए बहुत ज्यादा जरुरी माना। वो एक ऐसे नेता थे जिनसे आपकी चाहे लाख वैचारिक और सैद्धांतिक असहमति हो पर आप उनकी बातों को सुनेंगे जरूर और ज्यादतर बातों से सहमत भी होंगे।

                                                   
                  मौत की उमर क्या हैं? दो पल भी नहीं, 
                  ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। 

                  मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
                  लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूँ?     


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